आखिरी ख़त — by Kavita Rawat
अगली सुबह, मेहर की नींद एक अजीब सी बेचैनी के साथ खुली। रात भर उसने विक्रम की आख़िरी चेतावनी भरी नज़र के बारे में सपने देखे थे, और अब, दिन की रोशनी में भी, वह डर पूरी तरह गया नहीं था। उसने खिड़की से बाहर देखा — बागानों पर हल्की धुंध छाई थी, और सब कुछ हमेशा की तरह शांत लग रहा था, पर मेहर जानती थी, यह शांति धोखा भी हो सकती थी। नाश्ते पर, अदित्य ने एक नया प्रस्ताव रखा। "मैंने रात भर सोचा। हमें दिलावर…