आखिरी ख़त — by Kavita Rawat
सुबह की धूप देवगढ़ में भी कोहरे से लड़ते-लड़ते ही आती थी। मेहर की आँख खुली तो खिड़की के बाहर एक पतली, सुनहरी रोशनी की लकीर चाय बागानों पर बिछी हुई थी, मानो रातभर की बारिश ने पूरी घाटी को धोकर नया कर दिया हो। कुछ पल के लिए, आधी नींद में, मेहर भूल गई कि वह कहाँ है — फिर कल रात की सारी बातें, अदित्य ठाकुर की ठंडी आवाज़, रुक्मिणी की अधूरी बात, डायरी का वह पन्ना — सब कुछ एक साथ लौट आया। उसने तकिए के…