पहाड़ की चोटी पर वादा

आखिरी ख़त — by Kavita Rawat

दो महीने बीत गए। देवगढ़ में सर्दियाँ अपने पूरे शबाब पर थीं — पहाड़ों की चोटियाँ बर्फ़ से ढकी हुई थीं, हवा में हल्की-हल्की ठंडक थी, और हवेली के बगीचे में गुलाब की झाड़ियाँ खिलने लगी थीं, महीनों की उपेक्षा के बाद पहली बार फिर से देखभाल पाकर। मेहर की ज़िंदगी अब पूरी तरह देवगढ़ में बस चुकी थी। उसने रुक्मिणी बुआ सा की मदद से हवेली के एक हिस्से में एक छोटा-सा पुस्तकालय शुरू किया था, जहाँ देवगढ़ के…