धुंध में डूबी हवेली

आखिरी ख़त — by Kavita Rawat

बस देवगढ़ की आखिरी पहाड़ी मोड़ पर रुकी, और मेहर कपूर ने खिड़की का शीशा नीचे किया। ठंडी, नम हवा का एक झोंका अंदर आया, जिसमें चीड़ के पेड़ों की गंध और कहीं दूर बहती किसी नदी की सिहरन घुली हुई थी। कोहरा इतना घना था कि सामने की सड़क बस कुछ मीटर तक ही दिखाई दे रही थी। दस साल हो गए थे। दस साल, जब से नैना यहाँ आई थी — एक शोधकर्ता के तौर पर, चाय बागानों पर एक किताब लिखने के इरादे से — और कभी वापस नहीं…