आखिरी ख़त — by Kavita Rawat
"मैं डरता रहा," सोहम ने फिर दोहराया, अपने काँपते हाथों को देखते हुए। "इतने साल, मैं ख़ुद से यह झूठ बोलता रहा कि अगर मैं चुप रहूँ, तो शायद यह सब भूल जाएगा। पर यह कभी नहीं भूला। हर रात, मैं नैना का चेहरा देखता हूँ।" मेहर का गला सूख गया था। "सोहम, बताओ। जो भी हुआ, मुझे सच जानना है। दस साल हो गए इंतज़ार करते-करते।" सोहम ने गहरी साँस ली और झील की तरफ़ देखा, जैसे वहाँ अतीत की परछाइयाँ अभी भी तैर रही…