मेहंदी की रात और पीढ़ियों की बंदीश

आखिरी ख़त — by Kavita Rawat

मेहँदी की शाम आते-आते हवेली एक अलग ही रंग में रंग चुकी थी। लाल और सुनहरे कपड़ों से सजा आँगन, हर तरफ़ फूलों की लड़ियाँ, और बीच में एक बड़ा सा मंच जहाँ मेहर के लिए एक सजा हुआ झूला रखा गया था — रुक्मिणी बुआ सा की ख़ास फ़रमाइश पर, ताकि दुल्हन झूले पर बैठकर मेहँदी लगवाए, जैसा कि पुरानी पहाड़ी परंपरा में होता था। मेहर लाल और सुनहरे रंग के सूट में सजी, झूले पर बैठी, उसके चारों तरफ़ सहेलियाँ और परिवार की…